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Khuda Shayari

नजर नमाज नजरिया सब कुछ बदल गया,
एक रोज इश्क हुआ और, मेरा खुदा बदल गया.
न था कोई हमारा न हम किसी के हैं,
बस एक खुदा है और हम उसी के हैं.
ख़ुदा हम को ऐसी ख़ुदाई न दे,
कि अपने सिवा कुछ दिखाई न दे. – बशीर बद्र
ख़ुदा ऐसे एहसास का नाम है,
रहे सामने और दिखाई न दे.
तुम जिसे याद करो फिर उसे क्या याद रहे,
न ख़ुदाई की हो परवा न ख़ुदा याद रहे.
मेरा झुकना और तेरा खुदा हो जाना,
अच्छा नही इतना बड़ा हो जाना.
मैंने अपने आप को हँमेशा बादशाह समझा,
पर तुझे खुदा से माँगा अकसर फकीरों की तरह.
हम ख़ुदा के कभी काबिल ही न थे,
उन को देखा तो ख़ुदा याद आया.
अच्छा यक़ीं नहीं है तो कश्ती डुबा के देख,
इक तू ही नाख़ुदा नहीं ज़ालिम ख़ुदा भी है.
छोड़ा नहीं ख़ुदी को दौड़े ख़ुदा के पीछे,
आसाँ को छोड़ बंदे मुश्किल को ढूँडते हैं.
नीचे आ गिरती है हर बार दुआ मेरी,
पता नहीं कितनी ऊचाई पर खुदा रहता हैं.
दिलों में नज़दीकियाँ हो तो,
रिश्तों मैं खुदा बसता हैं.
मेरी आँखों में मत ढूंढा करो खुद को,
पता है ना दिल में रहते हो खुदा की तरह.
मत सोचना मेरी जान से जुदा है तू,
हकीकत में मेरे दिल का खुदा है तू.
ज़मीं को ऐ ख़ुदा वो ज़लज़ला दे,
निशाँ तक सरहदों के जो मिटा दे.
महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से,
ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है.
ख़ुदा की इतनी बड़ी काएनात में मैंने,
बस एक शख़्स को माँगा मुझे वही न मिला.
इस सादगी पे कौन न मर जाए ऐ ख़ुदा
लड़ते हैं और हाथ में तलवार भी नहीं.
तक़दीर के लिखे से सिवा बन गए हैं हम,
बंदा न बन सके तो ख़ुदा बन गए हैं हम.
हवा खिलाफ थी लेकिन चिराग भी खूब जला,
खुदा भी अपने होने का क्या क्या सबूत देता है.
तेरा करम तो आम है दुनिया के वास्ते,
मैं कितना ले सका यह मुकद्दर की बात है
देता सब कुछ है खुदा हमें,
पर जिसे चाहो उसे छोड़कर.
जहर पीने से कहाँ मौत आती है,
मर्जी खुदा की भी चाहिए मौत के लिए ?
भींगी पलकों से छुप छुप के बिदाई दी हैं
उफ् खुदा कैसी तुमने यह जुदाई दी हैं.
मजहबी इबारतें आती नहीँ मुझको,
आज भी इंसानीयत ही मेरा खुदा हुआ है.
उदास बच्चे के आंसू में रह गया खोकर,
जो कह रहा था मुझको खुदा नहीं मिलता.
उस वक़्त तो खुदा भी सोच में पड़ गया,
जब मैंने इश्क़ और सुकून दोनों साथ में माँग लिया.
ज़रा ये धूप ढल जाए तो उनका हाल पूछेंगे,
यहाँ कुछ साए अपने आपको खुदा बताते हैं.
आइना कोई ऐसा बना दे ऐ खुदा जो,
इंसान का चेहरा नहीं किरदार दिखा दे.
खुदा जाने, प्यार का दस्तूर क्या होता है
जिन्हें अपना बनाया वो न जाने क्यों दूर होता है.
सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं,
जिस को देखा ही नहीं उस को ख़ुदा कहते हैं.
कुछ तुम,कुछ तुम्हारा अंदाज़ ए गुफ्तगू,
मुझे तबाह कौन करेगा, खुदा ही जाने.
माँ ने रख दी आखिरी रोटी भी मेरी थाली मे,
मैं पागल फिर भी खुदा की तलाश करता हूँ.
खुदा आज भी है ज़मीं पर ये मुझको यकीं,
बस उसको देखने वाली निगाह चाहिए.
कमियों की गिनती जिस तरह करते है वो,
इंसान हो कर भी आप खुदा बन बैठे हो जैसे.
मिसाल उसकी क्या देगा ज़माना,
जिसे खुदा भी खुद लाजवाब कहता है.
तेरी मोहब्बत के साए में जिंदा हैं हम तो,
तुझे खुदा का दीया हुआ तावीज मानते हैं.
बंदगी हमने छोड़ दी ए फ़राज़,
क्या करें लोग जब ख़ुदा हो जाएँ.
ऐ आसमान तेरे ख़ुदा का नहीं है ख़ौफ़,
डरते हैं ऐ ज़मीन तेरे आदमी से हम.
ज़माना ख़ुदा को ख़ुदा जानता है
यही जानता है तो क्या जानता है.
न कर किसी पे भरोसा कि कश्तियाँ डूबें,
ख़ुदा के होते हुए नाख़ुदा के होते हुए.
मैं इक थका हुआ इंसान और क्या करता,
तरह तरह के तसव्वुर ख़ुदा से बाँध लिए.
जब कि तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा ऐ ख़ुदा क्या है.
जुबानी इबादत ही काफी नहीं,
खुदा’ सुन रहा है खयालात भी.
मुझे भी बना दे ऐ खुदा-दिल तोड़ने वाला,
कब-तक वफा करूँगा बेवफाओ के शहर मे.
झूठ, लालच और फरेब से परे है,
खुदा का शुक्र है, आइने आज भी खरे है.
मैं तुझसे अब कुछ नहीं मांगूगा ए खुदा,
तेरी देकर छीन लेने की आदत मुझे पसंद नही.
नए सिरे से तलाश कीजिए,
ख़ुदा जहाँ था वहाँ नहीं है.
आशिक़ी से मिलेगा ऐ ज़ाहिद,
बंदगी से ख़ुदा नहीं मिलता.
तुम इतना हुस्न आख़िर क्या करोगे,
अरे कुछ तो ख़ुदा के नाम पर दो.
मिट जाये गुनाहों का तसव्वुर ही जहां से,
अगर हो जाये यकीन के खुदा देख रहा है.
रहमत तेरी मोहताज है मेरे गुनाहों की,
मेरे बिना तू भी खुदा हो नहीं सकता.
खुदा के पास देने के तो हजार तरीके है,
मांगने वाले तू देख तुझ में कितने सलीके है.
तुम थक तो नहीं जाओगे इन्तजार में तब तक,
मैं माँग के आऊँ खुदा से तुमको जब तक.
वो जो दूसरो के लिए, दुआ करता है,
दुआएँ खुद उसकी, खुदा करता है.
तुझमे और खुदा में एक बात मिलती है,
वो भी नहीं मिलता है ,तू भी नहीं मिलती है.
कभी जो मुझे हक मिला अपनी तकदीर लिखने का,
कसम खुदा की तेरा नाम लिखूंगा और कलम तोड दूंगा.
मेरा दर्द तो सिर्फ मेरा खुदा जानता हैं,
तुमने तो सिर्फ मेरी मुस्कान देखी है.
वो पहले सा कहीं, मुझको कोई मंज़र नहीं लगता,
यहाँ लोगों को देखो, अब ख़ुदा का डर नहीं लगता.

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खुदा का शुक्र है की, ख्वाब बना दिये,
वरना तुम्हे देखने की तो, हसरत ही रह जाती.
वही रखेगा मेरे घर को बलाओं से महफूज,
जो शजर से घोसला गिरने नहीं देता।
हवा खिलाफ थी लेकिन चिराग भी खूब जला,
खुदा भी अपने होने का क्या क्या सबूत देता है।
एहसास-ए-निदामत, एक सजदा और चश्म-ए-तर,
ऐ खुदा कितना आसान है मनाना तुझ को।
खुदा को भूल गए लोग फ़िक्र-ए-रोज़ी में,
तलाश रिज्क की है राजिक का ख़याल नहीं।
मोहब्बत कर सकते हो तो खुदा से करो,
मिट्टी के खिलौनों से कभी वफ़ा मिलती नहीं।
एक मुद्दत के बाद हम ने ये जाना ऐ खुदा,
इश्क तेरी ज़ात से सच्चा है वाकी सब अफसाने।
करम जब आला-ए-नबी का शरीक होता है
बिगड़ बिगड़ कर हर काम ठीक होता है।
न था कोई हमारा न हम किसी के हैं,
बस एक खुदा है और हम उसी के हैं।
मिट जाये गुनाहों का तसव्वुर ही जहां से,
अगर हो जाये यकीन के खुदा देख रहा है।
आदम को मत खुदा कहो आदम खुदा नही,
लेकिन खुदा के नूर से आदम जुदा नहीं।
जहाँ सजदे को मन आया वहीं कर लिया सजदा,
न कोई संगे-दर अपना न कोई आस्तां अपना।
तिफ्ल-ए-शीरख्वार को ज्यों-ज्यों शऊर हो चला,
जितना खुदा के पास था उतना ही दूर हो चला।
तेरा करम तो आम है दुनिया के वास्ते,
मैं कितना ले सका यह मुकद्दर की बात है।
मुझ को ख़्वाहिश ही ढूढ़ने की न थी,
मुझ में खोया रहा ख़ुदा मेरा।
कश्तियाँ सब की किनारे पे पहुँच जाती हैं,
ना-ख़ुदा जिनका नहीं उनका ख़ुदा होता है।
गुनाह गिन के मैं क्यूँ अपने दिल को छोटा करूँ,
सुना है तेरे करम का कोई हिसाब नहीं।
खुदा आज भी है ज़मीं पर ये मुझको यकीं,
बस उसको देखने वाली निगाह चाहिए।
सलीका ही नहीं शायद उसे महसूस करने का,
जो कहता है ख़ुदा है तो नजर आना जरूरी है।
दुआ बारिश की करते हो मगर छतरी नहीं रखते,
भरोसा है नहीं तुमको खुदा पर क्या जरा सा भी।
इबादतखानों में क्या ढूंढते हो मुझे,
मैं वहाँ भी हूँ, जहाँ तुम गुनाह करते हो।
रहमत तेरी मोहताज है मेरे गुनाहों की,
मेरे बिना तू भी खुदा हो नहीं सकता।