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99+ Famous Urdu Shayari in Hindi

Urdu Shayari in Hindi
एक सो सोलह चाँद की रातें ,
एक तुम्हारे कंधे का तिल।
गीली मेहँदी की खुश्बू झूठ मूठ के वादे,
सब याद करादो, सब भिजवा दो,
मेरा वो सामान लौटा दो।।
सभी रिश्ते गुलाबों की तरह ख़ुशबू नहीं देते।
कुछ ऐसे भी तो होते हैं जो काँटे छोड़ जाते हैं।।
मजरूह लिख रहे हैं वो अहल-ए-वफ़ा का नाम।
हम भी खड़े हुए हैं गुनहगार की तरह ।।
किसने रास्ते मे चांद रखा था,
मुझको ठोकर लगी कैसे।
वक़्त पे पांव कब रखा हमने,
ज़िंदगी मुंह के बल गिरी कैसे।।
आंख तो भर आयी थी पानी से,
तेरी तस्वीर जल गयी कैसे।।।
ये आग और नहीं दिल की आग है नादां।
चिराग हो के न हो, जल बुझेंगे परवाने।।
कभी लफ़्ज़ों से गद्दारी न करना
ग़ज़ल पढ़ना ,अदाकारी न करना।
मेरे बच्चों के आंसू पोंछ देना
लिफ़ाफ़े का टिकट जारी न करना।।
ऐसा डूबा हूँ
तेरी याद के समंदर में “फ़राज़”।
दिल का धड़कना भी
अब तेरे कदमों की सदा लगती है।।
किसी से कोई भी उम्मीद रखना छोड़ कर देखो।
तो ये रिश्ते निभाना किस क़दर आसान हो जाये ।।
सामने आए मेरे, देखा मुझे, बात भी की,
मुस्कुराए भी, पुरानी किसी पहचान की ख़ातिर।
कल का अख़बार था, बस देख लिया, रख भी दिया।।
पलक से पानी गिरा है, तो उसको गिरने दो।
कोई पुरानी तमन्ना, पिंघल रही होगी। ।
तकदीर का शिकवा बेमानी,
जीना ही तुझे मंजूर नहीं।
आप अपना मुकद्दर बन न सके,
इतना तो कोई मजबूर नहीं।।
तुम्हारी राह में मिट्टी के घर नहीं आते।
इसीलिए तो तुम्हें हम नज़र नहीं आते ।।
दुख अपना अगर हम को बताना नहीं आता।
तुम को भी तो अंदाज़ा लगाना नहीं आता ।।
थी खबर गर्म के ग़ालिब के उड़ेंगे पुर्ज़े ।
देखने हम भी गए थे पर तमाशा न हुआ।।
टूट जाना चाहता हूँ, बिखर जाना चाहता हूँ,
में फिर से निखर जाना चाहता हूँ।
मानता हूँ मुश्किल हैं,
लेकिन में गुलज़ार होना चाहता हूँ।।
उसकी बातें मुझे खुशबू की तरह लगती हैं।
फूल जैसे कोई सेहरा में खिला करता है।।
मुझे पढ़ता कोई तो कैसे पढ़ता।
मिरे चेहरे पे तुम लिक्खे हुए थे।।
लाग् हो तो उसको हम समझे लगाव ।
जब न हो कुछ भी , तो धोखा खायें क्या ।।
तुम्हें जब रू-ब-रू देखा करेंगे ।
ये सोचा है बहुत सोचा करेंगे ।।
अब सोचते हैं लाएंगे तुझ सा कहाँ से हम ।
उठने को उठ तो आए तीरे आस्ताँ से हम ।।
बीच आसमाँ में था बात करते- करते ही,
चांद इस तरह बुझा जैसे फूंक से दिया ।
देखो तुम इतनी लम्बी सांस मत लिया करो।।
सितारों से आगे जहाँ और भी हैं ।
अभी इश्क़ के इम्तिहाँ और भी हैं ।।
हम उसे आंखों की दहलीज़ न चढ़ने देते ।
नींद आती न अगर ख़्वाब तुम्हारे लेकर ।।
आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक।
कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक।।
क्या बताऊँ ,कैसा ख़ुद को दरबदर मैंने किया ।
उम्र -भर किस – किसके हिस्से का सफ़र मैंने किया
तू तो नफरत भी न कर पायेगा इस शिद्दत के साथ
जिस बला का प्यार तुझसे बे-ख़बर मैंने किया।।
शबे इंतज़ार की कश्‍मकश ना पूछ
कैसे सहर हुई।
कभी एक चराग़ जला लिया,
कभी एक चराग़ बुझा दिया।।
सिर्फ़ हाथों को न देखो कभी आँखें भी पढ़ो ।
कुछ सवाली बड़े ख़ुद्दार हुआ करते हैं ।।
पत्ता पत्ता बूटा बूटा हाल हमारा जाने है ।
जाने न जाने गुल ही न जाने बाग़ तो सारा जाने है ।।
कहू क्या वो बड़ी मासूमियत से पूछ बैठे है ।
क्या सचमुच दिल के मारों को बड़ी तकलीफ़ होती है।।
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है।
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है।।
इस दिल का कहा मनो एक काम कर दो,
एक बे-नाम सी मोहब्बत मेरे नाम करदो।
मेरी ज़ात पर फ़क़त इतना अहसान कर दो,
किसी दिन सुबह को मिलो, और शाम कर दो।।
बहाने और भी होते जो ज़िन्दगी के लिए ।
हम एक बार तिरी आरजू भी खो देते ।।
जब भी आता है मिरा नाम तिरे नाम के साथ ।
जाने क्यूँ लोग मिरे नाम से जल जाते हैं ।।
मिली जब उनसे नज़र,
बस रहा था एक जहां ।
हटी निगाह तो चारों तरफ थे वीराने ।।
क्या ग़लत है जो मैं दीवाना हुआ, सच कहना ।
मेरे महबूब को तुम ने भी अगर देखा है ।।
फिर खो न जाएँ हम कहीं दुनिया की भीड़ में ।
मिलती है पास आने की मोहलत कभी कभी ।।
कोई ख़ामोश ज़ख़्म लगती है।
ज़िंदगी एक नज़्म लगती है।।
ऐ मोहब्बत तिरे अंजाम पे रोना आया।
जाने क्यूँ आज तिरे नाम पे रोना आया।।
वफ़ा की कौन सी मंज़िल पे उस ने छोड़ा था।
कि वो तो याद हमें भूल कर भी आता है।।
नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को।
ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं।।
क्या दुःख है समन्दर को बता भी नहीं सकता
आंसू की तरह आँख तक आ भी नहीं सकता।
तू छोड़ रहा है तो ख़ता इसमें तेरी क्या
हर शख्स मेरा साथ निभा भी नहीं सकता।।
फुर्सत मिले तो कभी हमें भी याद कर लेना फ़राज़।
बड़ी पुर रौनक होती हैं यादें हम फकीरों की ।।
जिस की आँखों में कटी थीं सदियाँ ।
उस ने सदियों की जुदाई दी है।।
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल।
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है।।
बचा लिया मुझे तूफ़ाँ की मौज ने वर्ना ।
किनारे वाले सफ़ीना मिरा डुबो देते।।
यह सोच कर कोई अहदे-वफ़ा करो हमसे।
हम एक वादे पे उम्रें गुज़ार देते हैं ।।
ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में ।
हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं ।।
किस किस से मुहब्बत के वादे किये हैं तू ने फ़राज़।
हर रोज़ एक नया शख्स तेरा नाम पूछता है ।।
वफ़ा की लाज में उसको मना लेते तो अच्छा था फ़राज़ ।
अना की जंग में अक्सर जुदाई जीत जाती है ।।
जफा के जिक्र पर तुम क्यों संभलकर बैठ गए ।
तुम्हारी बात नहीं, बात है जमाने की ।।
वो झूट बोल रहा था बड़े सलीक़े से ।
मैं ए’तिबार न करता तो और क्या करता ।।
उस से बिछड़े तो मालूम हुआ की
मौत भी कोई चीज़ है “फ़राज़”।
ज़िन्दगी वो थी जो हम उसकी
महफ़िल में गुज़ार आए ।।
ये न थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता।
अगर और जीते रहते यही इंतिज़ार होता।।
कुछ जख्मो की उम्र नहीं होती हैं ।
ताउम्र साथ चलते हैं, जिस्मो के ख़ाक होने तक।।
मुसलसल हादसों से बस मुझे इतनी शिकायत है ।
कि ये आँसू बहाने की भी तो मोहलत नहीं देते ।।
सैर-ए-साहिल कर चुके ऐ मौज-ए-साहिल सर ना मार ।
तुझ से क्या बहलेंगे तूफानों के बहलाए हुए ।।
एक बार तो यूँ होगा, थोड़ा सा सुकून होगा ।
ना दिल में कसक होगी, ना सर में जूनून होगा।।
हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी ।
कुछ हमारी ख़बर नहीं आती ।।
अब तक मिरी यादों से मिटाए नहीं मिटता ।
भीगी हुई इक शाम का मंज़र तिरी आँखें ।।
मैं चुप कराता हूं हर शब उमड़ती बारिश को ।
मगर ये रोज़ गई बात छेड़ देती है।।
रहते थे कभी जिनके दिल में,
हम जान से भी प्यारों की तरह ।
बैठे हैं उन्हीं के कूंचे में हम,
आज गुनहगारों की तरह ।।
फिर इतने मायूस क्यूँ हो उसकी बेवफाई पर “फ़राज़”।
तुम खुद ही तो कहते थे की वो सब से जुदा है ।।
उसे तेरी इबादतों पे यकीन है नहीं “फ़राज़”।
जिस की ख़ुशियां तू रब से रो रो के मांगता है ।।
ग़म-ए-हयात ने आवारा कर दिया वर्ना।
थी आरजू तेरे दर पे सुबह-ओ-शाम करें ।।
अपने साए से चौंक जाते हैं ।
उम्र गुज़री है इस क़दर तन्हा।।
हम ने अक्सर तुम्हारी राहों में ।
रुक कर अपना ही इंतिज़ार किया।।
दर्द हल्का है साँस भारी है ।
जिए जाने की रस्म जारी है।।
तेरी यादों के जो आखिरी थे निशान,
दिल तड़पता रहा, हम मिटाते रहे।
ख़त लिखे थे जो तुमने कभी प्यार में,
उसको पढते रहे और जलाते रहे।।
वो रोज़ देखता है डूबे हुए सूरज को “फ़राज़”।
काश मैं भी किसी शाम का मंज़र होता ।।
मेरे दर्द को भी आह का हक़ हैं,
जैसे तेरे हुस्न को निगाह का हक़ है।
मुझे भी एक दिल दिया है भगवान ने,
मुझ नादान को भी एक गुनाह का हक़ हैं।।
जो कभी हर रोज़ मिला करते थे ।
वो चेहरे तो अब ख़ाब ओ ख़याल हो गए ।।
उसकी जफ़ाओं ने मुझे
एक तहज़ीब सिख दी है फ़राज़।
मैं रोते हुए सो जाता हूँ पर
शिकवा नहीं करता ।।
अपने ही होते हैं जो दिल पे वार करते हैं फ़राज़।
वरना गैरों को क्या ख़बर की दिल की जगह कौन सी है ।।
दूरी हुई ,तो उनसे करीब और हम हुए।
ये कैसे फ़ासिले थे ,जो बढ़ने से कम हुए ।।