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99 Most Famous Shayari In Hindi

Most Famous Shayari In Hindi
धूप के एक ही मौसम ने जिन्हें तोड़ दिया।
इतने नाज़ुक भी ये रिश्ते न बनाये होते।।
हम आह भी करते हैं तो हो जाते हैं बदनाम ।
वो क़त्ल भी करते हैं तो चर्चा नहीं होता ।।
दोस्ती जब किसी से की जाए ।
दुश्मनों की भी राय ली जाए ।।
बहुत मुश्किल से करता हूँ, तेरी यादों का कारोबार ।
मुनाफा कम है, पर गुज़ारा हो ही जाता है ।।
तुम्हारी दुनिया में हम जैसे हजारों हैं “फ़राज़”
हम ही पागल थे जो तुम्हे पा के इतराने लगे ।।
दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है।
आख़िर इस दर्द की दवा क्या है।।
घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लें ।
किसी रोते हुए बच्चे को हँसाया जाए ।।
दूर से ही बस दरिया दरिया लगता है ।
डूब के देखो कितना प्यासा लगता है ।।
बचपन में भरी दुपहरी में नाप आते थे पूरा मोहल्ला ।
जब से डिग्रियां समझ में आयी पांव जलने लगे हैं।।
दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुँजाइश रहे ।
जब कभी हम दोस्त हो जायें तो शर्मिन्दा न हों ।।
कितना ख़ौफ होता है शाम के अंधेरों में ।
पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते ।।
आज हर ख़ामोशी को मिटा देने का मन है ।
जो भी छिपा रखा है मन में लूटा देने का मन है ।।
बहुत से ख़्वाब देखोगे तो आँखें ।
तुम्हारा साथ देना छोड़ देंगी ।।
अकेले तो हम पहले भी जी रहे थे “फ़राज़”
क्यूँ तन्हा से हो गए हैं तेरे जाने के बाद ।।
एक पल जो तुझे भूलने का सोचता हूँ “फ़राज़”
मेरी साँसें मेरी तकदीर से उलझ जाती हैं ।।
अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपाएँ कैसे?
तेरी मर्ज़ी के मुताबिक़ नज़र आएँ कैसे?
आइना देख कर तसल्ली हुई ।
हम को इस घर में जानता है कोई।।
दर्द जब दिल में हो तो दवा कीजिए।
दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिए।।
कौन देता है उम्र भर का सहारा “फ़राज़”
लोग तो जनाज़े में भी कंधे बदलते रहते हैं ।।
ग़नीमत है नगर वालों लुटेरों से लुटे हो तुम ।
हमें तो गांव में अक्सर, दरोगा लूट जाता है ।।
लोग टूट जाते हैं एक घर बनानें में ।
तुम तरस नहीं खाते बस्तियाँ जलानें में ।।
कौन सी बात कहाँ कैसे कही जाती है ।
ये सलीक़ा हो तो, हर बात सुनी जाती है ।।
घर के बुज़ुर्ग लोगों की आंखें क्या बुझ गईं ।
अब रोशनी के नाम पर कुछ भी नहीं रहा ।।
बेहिसाब हसरते ना पालिये ।
जो मिला हैं उसे सम्भालिये।।
किसी पर मर जाने से होती हैं मोहब्बत ।
इश्क जिंदा लोगों के बस का नहीं ।।
आँखों में हया हो तो , पर्दा दिल का ही काफी है “फ़राज़”
नहीं तो नकाबों से भी होते हैं इशारे मोहब्बत के ।।
हम ने सीने से लगाया दिल न अपना बन सका ।
मुस्कुरा कर तुम ने देखा दिल तुम्हारा हो गया ।।
इश्क़ ने ग़ालिब निकम्मा कर दिया।
वर्ना हम भी आदमी थे काम के।।
मैंने दबी आवाज़ में पूछा? मुहब्बत करने लगी हो?
नज़रें झुका कर वो बोली! बहुत।।
मेरे होंठों पे अपनी प्यास रख दो और फिर सोचो?
कि इसके बाद भी दुनिया में कुछ पाना ज़रूरी है ।।
तुम आ गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हों ।
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है ।।
मैं कब कहता हूँ वो अच्छा बहुत है।
मगर उस नें मुझे चाहा बहुत है ।।
रूठ जाने की अदा हम को भी आती है “फ़राज़”
काश होता कोई हम को भी मनाने वाला ।।
तुम आ गए हो तो कुछ चाँदनी सी बातें हों।
ज़मीं पे चाँद कहाँ रोज़ रोज़ उतरता है ।।
कोई पुछ रहा हैं मुझसे मेरी जिंदगी की कीमत।
मुझे याद आ रहा है तेरा हल्के से मुस्कुराना।।
न जी भर के देखा न कुछ बात की ।
बड़ी आरज़ू थी मुलाक़ात की ।।
नाज़ुकी उस के लब की क्या कहिए ।
पंखुड़ी इक गुलाब की सी है ।।
जी बहुत चाहता है सच बोलें ।
क्या करें हौसला नहीं होता ।।
मुझको मालूम नहीं हुस्न की तारीफ “फ़राज़”
मेरी नज़रों में हसीन वो है जो तुझ जैसा हो ।।
इतनी मिलती है मेरी गज़लों से सूरत तेरी ।
लोग तुझ को मेरा महबूब समझते होंगे ।।
बस तुझे उस नज़र से देखा है ।
जिस नज़र से तुझे नज़र न लगे ।।
होश वालों को ख़बर क्या बे-ख़ुदी क्या चीज़ है ।
इश्क़ कीजे फिर समझिए ज़िंदगी क्या चीज़ है ।।
शायर बनना बहुत आसान हैं ।
बस एक अधूरी मोहब्बत की मुकम्मल डिग्री चाहिए।।
किताबों से दलीलें दूं या खुद को सामने रख दूं, “फ़राज़”
वो मुझ से पूछ बैठी हैं मुहब्बत किसको कहते हैं ।।
ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है, ये इश्क़ क्या है ।
सुलगती सांसें, तरसती आंखें, मचलती रूहें, धड़कती छतियां ।।
पूछा जो उन से चाँद निकलता है किस तरह।
ज़ुल्फ़ों को रुख़ पे डाल के झटका दिया कि यूँ ।।
पलकें भी चमक जाती हैं सोते में हमारी।
आँखो को अभी ख्वाब छुपानें नहीं आते ।।
एक ही ख़्वाब ने सारी रात जगाया है।
मैं ने हर करवट सोने की कोशिश की।।
वो आए घर में हमारे ख़ुदा की क़ुदरत है ।
कभी हम उन को कभी अपने घर को देखते हैं ।।
महक रही है ज़मीं चाँदनी के फूलों से ।
ख़ुदा किसी की मोहब्बत पे मुस्कुराया है ।।
पहले सौ बार इधर और उधर देखा है ।
तब कहीं डर के तुम्हें एक बार देखा है ।।
झुकी झुकी सी नज़र बे-क़रार है कि नहीं ।
दबा दबा सा सही दिल में प्यार है कि नहीं ।।
मैं तेरे इश्क़ की छाँव में जल-जलकर,
काला न पड़ जाऊं कहीं ।
तू मुझे हुस्न की धूप का एक टुकड़ा दे।।
अंगड़ाई भी वो लेने न पाए उठा के हाथ ।
देखा जो मुझ को छोड़ दिए मुस्कुरा के हाथ।।
सारा बदन अजीब सी ख़ुशबू से भर गया ।
शायद तेरा ख़याल हदों से उतर गया ।।
ये इश्क़ नहीं आसाँ इतना ही समझ लीजे ।
इक आग का दरिया है और डूब के जाना है ।।
तुम को आता है प्यार पर ग़ुस्सा ।
मुझ को ग़ुस्से पे प्यार आता है ।।
किस ने भीगे हुए बालों से ये झटका पानी ।
झूम के आई घटा टूट के बरसा पानी ।।
उस की याद आई है साँसो ज़रा आहिस्ता चलो ।
धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है ।।
बहुत अंदर तक जला देती हैं ।
वो शिकायते जो बया नहीं होती।।
कुछ तो मजबूरियाँ रही होंगी ।
यूँ कोई बेवफ़ा नहीं होता ।।
बात उल्टी वो समझते हैं जो कुछ कहता हूँ ।
अब की पूछा तो ये कह दूँगा कि हाल अच्छा है ।।
उस शख्स से बस इतना सा ताल्लुक़ है “फ़राज़”
वो परेशां हो तो हमें नींद नहीं आती ।।
मोहब्बत के घरों के कच्चे-पन को ये कहाँ समझें ।
इन आँखों को तो बस आता है बरसातें बड़ी करना ।।
वफ़ा के नाम पे तुम क्यूँ संभल के बैठ गए।
तुम्हारी बात नहीं बात हैं ज़माने की ।।
उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़ ।
वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है ।।
बिगड़ैल हैं ये यादे ।
देर रात को टहलने निकलती हैं।।
हमारे घर की दीवारों पे ‘नासिर’
उदासी बाल खोले सो रही है ।।
तुझे पाने की कोशिश में कुछ इतना खो चुका हूँ मैं।
कि तू मिल भी अगर जाए तो, अब मिलने का ग़म होगा।।
सुनो !! ज़रा रास्ता तो बताना।
मोहब्बत के सफ़र से, वापसी है मेरी ।।
मोहब्बत के अंदाज़ जुदा होते हैं “फ़राज़”
किसी ने टूट के चाहा और कोई चाह के टूट गया ।।
वो शख्स जो कहता था तू न मिला तो मर जाऊंगा “फ़राज़”
वो आज भी जिंदा है यही बात किसी और से कहने के लिए ।।
यूँ तो हर शाम उमीदों में गुज़र जाती है ।
आज कुछ बात है जो शाम पे रोना आया ।।
फिर वहीं लौट के जाना होगा।
यार ने कैसी रिहाई दी है।।
तुम ज़माने की राह से आए ।
वर्ना सीधा था रास्ता दिल का ।।
थक गया मैं करते करते याद तुझ को ।
अब तुझे मैं याद आना चाहता हूँ ।।
तकलीफ़ ख़ुद की कम हो गयी ।
जब अपनों से उम्मीद कम हो गईं।।
दिल अगर हैं तो दर्द भी होंगा ।
इसका शायद कोई हल नहीं हैं।।
बस यही आदत उसकी मुझे अच्छी लगती है “फ़राज़”
उदास कर के मुझे भी वो खुश नहीं रहता ।।
तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं ।
किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं।।
तेरा मिलना ख़ुशी की बात सही ।
तुझ से मिल कर उदास रहता हूँ ।।
कैसे करें हम ख़ुद को तेरे प्यार के काबिल।
जब हम बदलते हैं, तुम शर्ते बदल देते हो।।
तेरे जाने से तो कुछ बदला नहीं।
रात भी आयी और चाँद भी था, मगर नींद नहीं।।
दिल अभी पूरी तरह टूटा नहीं ।
दोस्तों की मेहरबानी चाहिए।।
चुपके चुपके रात दिन आँसू बहाना याद है ।
हम को अब तक आशिक़ी का वो ज़माना याद है।।
इक रात वो गया था जहाँ बात रोक के ।
अब तक रुका हुआ हूँ वहीं रात रोक के।।
ग़म मौत का नहीं है,
ग़म ये के आखिरी वक़्त भी,
तू मेरे घर नहीं है।।
अच्छा ख़ासा बैठे बैठे गुम हो जाता हूँ ।
अब मैं अक्सर मैं नहीं रहता तुम हो जाता हूँ।।
एक नफरत ही नहीं दुनिया में दर्द का सबब “फ़राज़”
मोहब्बत भी सकूँ वालों को बड़ी तकलीफ़ देती है ।।
उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो ।
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए ।।
छोटी-छोटी बातें करके बड़े कहाँ हो जाओगे ।
पतली गलियों से निकलो तो खुली सड़क पर आओगे ।।
मिलता तो बहुत कुछ है इस ज़िन्दगी में ।
​बस हम गिनती उसी की करते है जो हासिल ना हो सका ।।
हाथों की लकीरों पे मत जा ऐ गालिब ।
नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते।।
अंजाम-ए-वफ़ा ये है जिस ने भी मोहब्बत की ।
मरने की दुआ माँगी जीने की सज़ा पाई।।
ज़िन्दगी तूनें मुझे कब्र से कम दी है ज़मीं।
पाँव फ़ैलाऊँ तो दीवार में सर लगता है ।।
मैं अकेला ही चला था जानिबे मंजिल मगर।
लोग आते गए और कारवां बनता गया ।।
आसमाँ इतनी बुलंदी पे जो इतराता है।
भूल जाता है ज़मीं से ही नज़र आता है ।।
बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं ।
तुझे ऐ ज़िंदगी हम दूर से पहचान लेते हैं।।
इस तरह गौर से मत देख मेरा हाथ ऐ “फ़राज़”
इन लकीरों में हसरतों के सिवा कुछ भी नहीं ।।
वक़्त रहता नहीं कहीं टिक कर।
आदत इस की भी आदमी सी है।।
वो रोज़ देखता है डूबे हुए सूरज को “फ़राज़”
काश मैं भी किसी शाम का मंज़र होता ।।
ज़िंदगी ज़िंदा-दिली का है नाम ।
मुर्दा-दिल ख़ाक जिया करते हैं।।
चाहे जितना भी बिगड़ जाए ज़माने का चलन।
झूठ से हारते देखा नहीं सच्चाई को ।।
दीवार क्या गिरी मेरे कच्चे मकान की “फ़राज़”
लोगों ने मेरे घर से रास्ते बना लिए ।।
उजाले अपनी यादों को हमारे साथ रहने दो।
न जाने किस गली में ज़िन्दगी की शाम हो जाये।।
मैं अकेला ही चला था जानिब-ए-मंज़िल मगर ।
लोग साथ आते गए और कारवाँ बनता गया।।
मैं ज़िंदगी का साथ निभाता चला गया ।
हर फ़िक्र को धुएँ में उड़ाता चला गया।।
ये कह कर मुझे मेरे दुश्मन हँसता छोड़ गए “फ़राज़”,
तेरे दोस्त काफी हैं तुझे रुलाने के लिए ।।
ज़िंदगी यूँ हुई बसर तन्हा ।
क़ाफ़िला साथ और सफ़र तन्हा। ।
कुछ है कि जो घर दे नहीं पाता है किसी को।
वर्ना कोई ऐसे तो सफ़र में नहीं रहता ।।
एक दिन तुझ से मिलनें ज़रूर आऊँगा।
ज़िन्दगी मुझ को तेरा पता चाहिये ।।
जब भी चाहेगा छीन लेगा वो।
सब उसी का है आपका क्या है ।।
कभी जिंदगी एक पल में गुजर जाती हैं।
और कभी जिंदगी का एक पल नहीं गुजरता।।
शाम तक सुबह की नज़रों से उतर जाते हैं।
इतने समझौतों पे जीते हैं कि, मर जाते हैं।।
एक सपने के टूटकर चकनाचूर हो जाने के बाद।
दूसरा सपना देखने के हौसले का नाम जिंदगी हैं।।
सफ़र की आज कैसी इंतेहा है।
मुसाफ़िर लौट जाना चाहता है।।
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है।
ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है।।
उसी को जीने का हक़ है जो इस ज़माने में।
इधर का लगता रहे और उधर का हो जाए।।